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बैंकों के बकाया पैसे न चुकाने वाले और सरकार की ओर से भगोड़ा घोषित किए गए विजय माल्या ने अपने ऊपर हो रही कानूनी कार्रवाई को भारत सरकार का अन्याय बताया है। लंदन में रह रहे भारत के भगोड़े कारोबारी विजय माल्या ने भारत सरकार पर अन्याय करने का आरोप लगाया। विजय माल्य़ा ने कहा कि सोचता हूं कॉकरोच बन जाऊं। साथ ही उन्होंने कहा कि ब्रिटेन में चल रही कानूनी प्रक्रिया के कारण वे भारत नहीं लौट पा रहे हैं।
माल्या ने दावा किया कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने बॉम्बे हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे में उनसे 14,000 करोड़ रुपए से ज्यादा की वसूली की बात मानी है। विजय माल्या पर किंगफिशर एयरलाइंस के लिए SBI समेत कई बैंकों से करीब ₹9,000 करोड़ का कर्ज लेने और उसे नहीं चुकाने का आरोप है।
भगोड़े कारोबारी विजय माल्या ने सोशल मीडिया एक्स पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के एक हलफनामे का जिक्र किया जिसके बारे में उनका दावा था कि इसे बॉम्बे हाई कोर्ट में दाखिल किया गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि एजेंसी ने 14,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की रिकवरी और उसे बैंकों को ट्रांसफर करने की पुष्टि की थी। अगर आपको मुझ पर भरोसा नहीं है तो मेरी बात भूल जाइए। एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट ने जो कहा है, उस पर ध्यान दीजिए। जो लोग सही और सही अकाउंटिंग न्याय में विश्वास करते हैं, कृपया नीचे दी गई टेबल देखें। क्या मैं अब भी उसी तरह का हकदार हूँ जिस तरह मीडिया मुझे बुरा-भला कहता है और एक पत्रकार की स्क्रिप्ट की शुरुआत में ही मुझे धोखेबाज़ कहता है? क्यों न यह पूछना शुरू किया जाए कि मुझे मेरा रिफंड कब मिलेगा?
मैं 1992 से यूनाइटेड किंगडम का स्थायी निवासी
माल्या ने खुद को भगोड़ा कहे जाने पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि बैंक का बकाया चुकाना भारत में उनकी मौजूदगी पर निर्भर नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि जो लोग कहते हैं कि मैं भारत आने से इनकार करने वाला भगोड़ा हूं, उन्हें बता दूं कि मैं 1992 से यूनाइटेड किंगडम का स्थायी निवासी हूं और अभी कानूनी तौर पर इस देश को छोड़ने पर रोक लगी हुई है। यह सब भारत सरकार की पोस्टर बॉय वाली हरकतों से शुरू हुआ, जिन्होंने मेरे मामले में बहुत अन्याय किया है।
उन्होंने आगे लिखा- मेरे ट्वीट्स पर मिले-जुले जवाब देने के लिए आप सभी का धन्यवाद। प्यार और नफ़रत साथ-साथ चलते हैं और मैं इसे सम्मान के साथ स्वीकार करता हूँ, साथ ही आपकी राय भी विनम्रता से स्वीकार करता हूँ। लेकिन जो लोग परमानेंट रेजिडेंसी और सिटिज़नशिप के बीच का अंतर नहीं समझते हैं और जो सोचते हैं कि रीपेमेंट फिजिकल प्रेजेंस पर आधारित होते हैं, कृपया दोबारा सोचें।
14,131.60 करोड़ रुपये की रिकवरी का जिक्र
माल्या ने बॉम्बे हाई कोर्ट में ईडी द्वारा दायर हलफनामे का एक अंश पोस्ट किया और 14,131.60 करोड़ रुपये की राशि की ओर इशारा किया। उन्होंने लिखा- और क्या मैं फिर से कह सकता हूं, सबसे खतरनाक आपराधिक एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय द्वारा अदालत में दायर हलफनामे से पुष्टि होती है कि उन्होंने 2021 में बैंकों को 14,000 से अधिक करोड़ रुपये सौंपे। अगर आपको मुझ पर भरोसा नहीं है तो मैं जो कहता हूं उसे भूल जाइए। प्रवर्तन निदेशालय ने जो कहा उस पर ध्यान दें।
अंत में विजय माल्या ने लिखा- मैंने जितने भी अन्याय झेले हैं और झेल रहा हूँ, उन्हें देखते हुए मैं सोचता हूँ कि क्या मुझे कॉकरोच बन जाना चाहिए। शायद कॉकरोच की तरफ़ बेहतर ज़िंदगी मिल जाए।

नर्मदापुरम। मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम में एक नाबालिग के साथ दुष्कर्म और जबरन गर्भपात कराने का गंभीर मामला सामने आया है। पुलिस ने पीड़िता की शिकायत पर मुख्य आरोपी अजीत सिंह और उसकी मदद करने वाली एक महिला डॉक्टर व परिजनों सहित कुल 6 लोगों के खिलाफ पॉक्सो एक्ट और अन्य संबंधित धाराओं में अपराध दर्ज किया है। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए 5 आरोपियों को अभिरक्षा में ले लिया है। मामला कोतवाली थाना क्षेत्र का है।
पुलिस के अनुसार, डोलरिया क्षेत्र निवासी मुख्य आरोपी अजीत सिंह ने 17 वर्षीय एक लड़की को प्यार और शादी का झांसा दिया। 23 अक्टूबर 2025 को वह पीड़िता को घुमाने के बहाने नर्मदापुरम ले गया और आनंद नगर स्थित पलाश होटल के कमरे में ले जाकर उसके साथ जबरन संबंध बनाए। घटना के कुछ समय बाद जब पीड़िता गर्भवती हो गई, तो आरोपी ने 19 फरवरी को एक महिला डॉक्टर स्वाती मिर्धा की मदद से दवा देकर उसका गर्भपात करा दिया। इस कृत्य में आरोपी के परिजनों (मां, बहन, बड़ी मां और चाचा) ने भी आरोपी का साथ दिया। इसके बाद आरोपी पीड़िता को जान से मारने की धमकी देकर चुप कराता रहा।
​घटना के लगभग 8 महीने बाद जब मुख्य आरोपी पीड़िता को बदनाम करने लगा, तो परेशान होकर पीड़िता ने पूरी बात अपने परिजनों को बताई। इसके बाद पीड़िता ने कोतवाली थाने पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई। शिकायत मिलते ही पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया। ​मामले की जांच के तहत एसआई दीपिका लोखंडे ने घटनास्थल पलाश होटल पहुंचकर उस कमरे का निरीक्षण किया। एएसपी अभिषेक राजन ने बताया कि मामले में मुख्य आरोपी समेत 6 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है, जिसमें से 5 आरोपियों को पुलिस अभिरक्षा में लिया जा चुका है। अन्य की तलाश जारी है।

इंदौर. सिंहस्थ कुंभ 2028 से पहले उज्जैन में सड़क और यातायात व्यवस्था को लेकर चल रही तैयारियों को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट से महत्वपूर्ण कानूनी आधार मिल गया है. महाकाल मंदिर के समीप स्थित शाही मस्जिद के एक हिस्से को हटाकर सड़क चौड़ी करने के नगर निगम के निर्णय के खिलाफ दायर दो याचिकाओं को हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया. अदालत ने माना कि नगर निगम ने कार्रवाई से पहले संबंधित पक्षों को सुनवाई का अवसर दिया और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया.
न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट की पीठ ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए कहा कि प्रस्तावित कार्रवाई को संविधान के अनुच्छेद 14, 25, 26 और 300-ए का उल्लंघन नहीं माना जा सकता. अदालत के सामने मुख्य सवाल केवल धार्मिक संरचना के प्रभावित होने का नहीं था, बल्कि यह भी था कि सार्वजनिक सड़क के विस्तार के लिए की जा रही कार्रवाई मनमानी है या कानून के अनुरूप.
उज्जैन में वर्ष 2028 में सिंहस्थ कुंभ होना है. महाकालेश्वर मंदिर और क्षिप्रा नदी के आसपास का क्षेत्र इस आयोजन के दौरान श्रद्धालुओं की भारी आवाजाही वाला प्रमुख क्षेत्र रहेगा. ऐसे में सड़क की क्षमता, पैदल यात्रियों की आवाजाही और वाहनों के दबाव को लेकर प्रशासन अभी से तैयारी कर रहा है.
नगर निगम का कहना था कि शाही सवारी, पेशवाई और सिंहस्थ के दौरान लाखों श्रद्धालुओं की आवाजाही के बीच मौजूदा मार्गों पर यातायात का दबाव काफी बढ़ सकता है. इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए सड़क को 15 मीटर तक चौड़ा करने की योजना बनाई गई है.
मस्जिद के प्रबंधन का दावा करने वाले दो पक्षों ने नगर निगम के नोटिस और प्रस्तावित कार्रवाई को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी. उनका कहना था कि सड़क चौड़ीकरण के लिए मस्जिद के जिस हिस्से को हटाने की योजना है, उसमें जमातखाना, करीब 120 फुट ऊंची मीनार और मजहर चौक शाही का हिस्सा प्रभावित होगा.
याचिकाकर्ताओं ने मस्जिद को पुरानी धार्मिक संरचना बताते हुए तर्क दिया कि नमाज स्थल, वजू की सुविधा और मीनार केवल भवन के हिस्से नहीं हैं, बल्कि धार्मिक गतिविधियों से जुड़े महत्वपूर्ण अंग हैं. इसलिए सड़क चौड़ीकरण के नाम पर इनका प्रभावित होना धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ा प्रश्न है.
नगर निगम ने अदालत के समक्ष अपने पक्ष में कहा कि प्रस्तावित कार्रवाई पूरी मस्जिद को प्रभावित नहीं करती. निगम के अनुसार मस्जिद के कुल ढांचे के 10 प्रतिशत से भी कम हिस्से को हटाने की आवश्यकता है.
निगम ने यह भी बताया कि उज्जैन में सड़क चौड़ीकरण की व्यापक योजना के तहत करीब 90 धार्मिक संरचनाओं को हटाने या स्थानांतरित करने की कार्रवाई की जा रही है. इनमें मंदिर और मस्जिद दोनों शामिल हैं. निगम के अनुसार 10 मंदिर और एक मस्जिद पहले ही हटाए जा चुके हैं.
इसी आधार पर निगम ने भेदभाव के आरोप को खारिज किया और कहा कि कार्रवाई किसी एक धर्मस्थल को निशाना बनाकर नहीं की जा रही है, बल्कि सड़क विस्तार की व्यापक योजना का हिस्सा है.
याचिकाकर्ताओं ने अदालत के सामने यह भी दलील रखी कि सड़क चौड़ी करने के लिए वैकल्पिक जमीन उपलब्ध है. उनका कहना था कि यदि मार्ग में उपलब्ध दूसरी भूमि का उपयोग किया जाए तो मस्जिद की संरचना को नुकसान पहुंचाए बिना भी यातायात परियोजना को आगे बढ़ाया जा सकता है.
यह तर्क इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि मामला केवल धार्मिक अधिकारों तक सीमित नहीं था. यदि समान उद्देश्य कम नुकसान के साथ किसी दूसरे विकल्प से पूरा किया जा सकता हो तो प्रशासन को उस विकल्प पर विचार करना चाहिए या नहीं, यह भी न्यायिक समीक्षा का हिस्सा बन सकता है.
अदालत ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए निगम की कार्रवाई को केवल इस आधार पर मनमाना या पक्षपातपूर्ण नहीं माना.
याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि शाही मस्जिद वक्फ संपत्ति के रूप में पंजीकृत है और मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड को समुचित तरीके से नोटिस नहीं दिया गया. इसके अलावा नगर निगम अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं होने का दावा भी किया गया.
हाई कोर्ट ने उपलब्ध रिकॉर्ड की जांच के बाद पाया कि मस्जिद के प्रबंधन से जुड़े पक्षों को सुनवाई का अवसर दिया गया था. संबंधित आपत्तियों पर विचार करने के बाद कार्रवाई से जुड़े आदेश पारित किए गए. ऐसे में केवल प्रक्रिया पर सवाल उठाकर निगम की पूरी कार्रवाई को निरस्त करने का आधार अदालत को नहीं मिला.
याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन से जुड़े अधिकारों का हवाला दिया था. उनका तर्क था कि सार्वजनिक उद्देश्य का हवाला देकर किसी पुराने धार्मिक स्थल के आवश्यक हिस्से को प्रभावित नहीं किया जा सकता.
हाई कोर्ट ने हालांकि मामले की परिस्थितियों में माना कि प्रस्तावित कार्रवाई को धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता. अदालत ने यह भी देखा कि कार्रवाई किसी एक धार्मिक समुदाय तक सीमित नहीं बताई गई है और निगम ने सड़क चौड़ीकरण परियोजना के तहत अन्य धार्मिक संरचनाओं के संबंध में भी कदम उठाए हैं.
याचिकाकर्ताओं की एक प्रमुख आपत्ति यह थी कि निगम की कार्रवाई चयनात्मक और भेदभावपूर्ण है. अदालत ने इस पहलू पर भी रिकॉर्ड में मौजूद जानकारी को देखा.
नगर निगम द्वारा बड़ी संख्या में धार्मिक संरचनाओं के संबंध में कार्रवाई किए जाने की जानकारी को ध्यान में रखते हुए पीठ ने माना कि उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि शाही मस्जिद के खिलाफ कार्रवाई केवल धार्मिक पहचान के आधार पर की जा रही है.
फैसले का व्यापक महत्व इस बात में है कि अदालत ने सार्वजनिक परियोजना और धार्मिक संरचना के विवाद को केवल धार्मिक अधिकारों के चश्मे से नहीं देखा. सिंहस्थ जैसे बड़े आयोजन में यातायात, श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सार्वजनिक सुविधाओं की आवश्यकता को भी मामले का हिस्सा माना गया.
साथ ही अदालत ने यह भी देखा कि प्रशासन ने प्रभावित पक्ष को सुनवाई का अवसर दिया या नहीं और कार्रवाई मनमानी तरीके से तो नहीं की गई. यानी सड़क चौड़ीकरण अपने आप में कार्रवाई को वैध नहीं बनाता, बल्कि उसके लिए कानूनी प्रक्रिया और परिस्थितियों का पालन भी जरूरी है.
दोनों याचिकाएं खारिज होने के बाद शाही मस्जिद के प्रभावित हिस्से को लेकर नगर निगम की कार्रवाई के सामने फिलहाल हाई कोर्ट स्तर पर बाधा नहीं रही. अब आगे की प्रक्रिया प्रशासनिक स्तर पर होगी.
हालांकि सड़क चौड़ीकरण का काम केवल एक संरचना से जुड़े निर्णय तक सीमित नहीं है. सिंहस्थ 2028 को देखते हुए उज्जैन में सड़कों, यातायात मार्गों और श्रद्धालुओं की आवाजाही से जुड़े कई विकास कार्य प्रस्तावित हैं. ऐसे में धार्मिक और ऐतिहासिक संरचनाओं से जुड़े मामलों में प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती विकास कार्यों को आगे बढ़ाते हुए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया, प्रभावित पक्षों की आपत्तियों और सार्वजनिक हित के बीच संतुलन बनाए रखना होगी.
हाई कोर्ट के इस आदेश से फिलहाल इतना स्पष्ट है कि उपलब्ध रिकॉर्ड और मामले की परिस्थितियों में शाही मस्जिद के प्रभावित हिस्से को हटाकर सड़क चौड़ी करने की नगर निगम की कार्रवाई को अदालत ने असंवैधानिक या मनमाना नहीं माना है. दोनों याचिकाएं खारिज कर दी गई हैं.

गुना। (सिकंदर जाट ) गुना जिले के आरोन थाना क्षेत्र अंतर्गत एक कॉलोनी में चोरों ने सूने  घर को निशाना बनाया और उसे घर के अंदर रखे सरकारी लैपटॉप सहित लक्ष्मी और लड्डू गोपाल जी की मूर्ति सहित अन्य कीमती सामान चोर चोरी करके ले गए। पुलिस ने मामले में मामला पंजीबद्ध कर जांच में लिया है। 

फरियादी रिंकू ओझा पुत्र सरनामसिंह ओझा उम्र-35 साल निवासी ब्लाक कलोनी आरोन थाना आऱोन ने  रिपोर्ट की कि में सुबह 9.30 बजे गुना न्यायालय पेशी के लिए निकल गया था। मेरे बच्चे स्कूल गये हुए थे एवं मेरी पत्नि प्रतिभा ओझा सुबह 08.00 बजे स्कूल पढाने निकल गयी थी । घर पर ताला लगा हुआ था । जव मेरी पत्नि प्रतिभा ओझा स्कूल से वापस 01.30 बजे आयी और ताला खोला और अंदर देखा तो घर का पूरा सामान अस्त वस्त था। 
तो मेरी पत्नि ने मुझे फोन लगाकर बताया की अपने घर में चोरी हो गयी है । पूरा सामान अस्त वस्त पडा हुआ है । उसके बाद में घर पर आया तव मेंने औऱ मेरी पत्नि प्रतिभा ओझा ने घर का सामान देखा तो मेरा सरकारी लैपटॉप, खाने पीने का महीने का राशन ,लक्ष्मी जी ,लड्डू गोपाल जी की पीतल की मूर्तियां,घर की व मोटर साईकिल की चावियां घरेलू औजारो का टूल वक्स कोई अज्ञात चोर चोरी कर ले गया ।
आरोन थाना पुलिस ने इस मामले में मामला पंजीबद्ध कर जांच में लिया है। 

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